(दोहे)

रखिये ऐसा दोस्त जो,

नीम की भांति होय ।

कड़वा-कड़वा बोल के,

सद्गुण तुझ में बोय ।।


दोस्त भले ही कम रखें,

पर हो सच्चा यार ।

संकट में जब तुम पड़ो,

तुझको लेय उबार ।।


कृष्ण गर तुम बने कभी,

नहीं सुदामा भूल ।

दोस्त मुश्किल से मिलते,

करिये बात कबूल ।।


अवगुण अपने दोस्त के,

मुख पर बोलो यार ।

पीठ बड़ाई तुम करो,

उत्तम यही विचार ।।


जो भी तेरे राज हैं,

मन में रक्खे गोय ।

जो आपसे नहीं जले,

दोस्त असल में होय ।।


रिश्ता दोस्ती का यहाँ,

क्षीर-नीर का संग।

नींबू-सी खटास मिले,

रिश्ता होते भंग।।

   ✒© विनय कुमार बुद्ध

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