(बाल कविता)

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हाथी मामा अकड़ू थे,

अपनी मन की करते थे,

नानी जी समझाती पर,

नहीं किसी की सुनते थे।।


घर का खाना छोड़-छाड़,

उल्टा-पुल्टा खाते थे ।

हरी सब्जी, सलाद छोड़,

पिज्जा-बर्गर खाते थे ।।


देर रात तक जगकर वो,

बिस्तर पर हीं पढ़ते थे।

दिन चढ़ने तक वो सोते,

बड़ी देर से उठते थे ।।


समय परीक्षा का आया,

तबियत उनकी बिगड़ गई।

डॉक्टर ने दवा खिलाई,

फिर उनको सुई लग गई।।


एक साल बरबाद हुआ,

दोस्त सभी पास हो गए।

हाथी मामा हाथ मले,

सब दोस्तों से पिछड़ गए।।


कान पकड़ कर फिर बोले,

अब गलती नहीं करूंगा।

माँ-बापू की बात सदा,

जीवन भर अब मानूंगा ।

       ✒ विनय कुमार बुद्ध