उसने,

न कुछ ज्यादा

न कुछ कम किया है,

सिर्फ

अपना हिसाब 

बराबर किया है।


जिसे,

मंदिर की सीढ़ियों से

रोता उठा लाया था,

आज वही 

हमदोनों को 

उसी सीढियों पर,

रोता छोड़ गया है।।


हालात

कुछ एक सी थी,

वो भी असहाय था,

अब मैं भी हूँ।

फर्क 

बस इतनी सी,

वो सात दिन का था,

मैं सत्तर साल का हूँ।

✒️ विनय कुमार बुद्ध