बेटी तो ससुराल की,

पूत गए परदेस ।

घर में बस दोनों बचे,

बूढ़ा-बुढ़िया शेष ।।


टुकुर-टुकुर दोनों तके,

नैन बहाये नीर ।

अपने ही जब घाव दे,

किसे सुनाये पीर ।।


इक दूजे के पोछते,

आँसू बारम्बार ।

भाग्य-रेख में क्या लिखा,

करता यही विचार ।।

✒️ विनय कुमार बुद्ध