मन का घोड़ा दौड़ता,
पकड़े रहो लगाम।
जिसने थोड़ी ढील दी,
गिरता वही धड़ाम।।
मन के गहरे चोट से,
बच कर रहना आप।
कोमल इसके रूप हैं,
तनिक सहे ना ताप।।
मन को काबू में रखो,
इसको कर मजबूत।
बन पतंग उड़ता फिरे,
ढील करो मत सूत।।
तुम मन से मत हारना,
मन के हारे हार।
नजर उठा कर देख लो,
जीत खड़ी है द्वार।।
जीवन पिसता बीच में,
सुख-दुख के दो पाट।
मस्त-मगन हो तुम
यहाँ,
अपने जीवन काट।।
✒©
विनय कुमार
बुद्ध

16 टिप्पणियाँ
सुखद और शांति प्रिय जीवन जीने के लिए राह बताता यह कविता।
जवाब देंहटाएंहृदयतल से आभार
हटाएंबिलकुल सही तरीके से जीवन जीने की प्रेरणा देती है ये कविता सर जी! मैं आपकी इस लेखन कला का फैंन हो गया हूं सर !,
जवाब देंहटाएंमैं भी आपके प्रोत्साहन के कारण लिख पाता हूँ, आप जैसे पाठक नहीं तो मैं कुछ भी नहीं
हटाएंBhut hi sunder line sir
जवाब देंहटाएंdahnyavad jee, is par amal bhi kijiye
हटाएंBhot acha h...
जवाब देंहटाएंdhanyavaad aapaka
हटाएंमन के सारे हार है मन के जीते जीत।
जवाब देंहटाएंएकदम सही
हटाएंbhut hi sundar or true margdarshan
जवाब देंहटाएंRamjash saini
thank you so much
हटाएंमन को काबू में रख , इसको करो मजबूत l
जवाब देंहटाएंबहुत ही प्रेरणादायक कविता🙏🙏
आभार, मैंने इसे सुशांत सिंंह राजपूत के आत्महत्या की घटना के बाद लिखा है
हटाएंइस कविता का तात्पर्य बहुत ही खूबसूरत(सुंदर) है !अपने मन को कंट्रोल करो
जवाब देंहटाएं,इसे पहले की मन आप को कंट्रोल कर
सही कहा आपने
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