मन

 



मन का घोड़ा दौड़ता,

पकड़े रहो लगाम।

जिसने थोड़ी ढील दी,

गिरता वही धड़ाम।।

 

मन के गहरे चोट से,

बच कर रहना आप।

कोमल इसके रूप हैं,

तनिक सहे ना ताप।।

 

मन को काबू में रखो,

इसको कर मजबूत।

बन पतंग उड़ता फिरे,

ढील करो मत सूत।।

 

तुम मन से मत हारना,

मन के हारे हार।

नजर उठा कर देख लो,

जीत खड़ी है द्वार।।

 

जीवन पिसता बीच में,

सुख-दुख के दो पाट।

मस्त-मगन हो तुम यहाँ,

अपने जीवन काट।।

   © विनय कुमार बुद्ध

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16 टिप्पणियाँ

  1. सुखद और शांति प्रिय जीवन जीने के लिए राह बताता यह कविता।

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  2. बिलकुल सही तरीके से जीवन जीने की प्रेरणा देती है ये कविता सर जी! मैं आपकी इस लेखन कला का फैंन हो गया हूं सर !,

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    1. मैं भी आपके प्रोत्साहन के कारण लिख पाता हूँ, आप जैसे पाठक नहीं तो मैं कुछ भी नहीं

      हटाएं
  3. मन के सारे हार है मन के जीते जीत।

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  4. मन को काबू में रख , इसको करो मजबूत l
    बहुत ही प्रेरणादायक कविता🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभार, मैंने इसे सुशांत सिंंह राजपूत के आत्महत्या की घटना के बाद लिखा है

      हटाएं
  5. इस कविता का तात्पर्य बहुत ही खूबसूरत(सुंदर) है !अपने मन को कंट्रोल करो
    ,इसे पहले की मन आप को कंट्रोल कर

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