(धारा-प्रवाह कविता)

मैं भारत की चल रेखा हूँ।

मैं इसकी जीवन रेखा हूँ।

मैं सेवा-भाव समर्पण हूँ।

मैं प्रिय भारत का दर्पण हूँ।

मैं ईद बैसाखी होली हूँ।

मैं जन-गण-मन की बोली हूँ।

मैं हर मजहब हर बोली हूँ।

मैं भारत की रंगोली हूँ।

मैं एक भागती गोली हूँ।

मैं एक समर्पित टोली हूँ।

मैं पूरब की पुरवाई हूँ।

मैं पश्चिम की परछाईं हूँ।

मैं उत्तर की तरूणाई हूँ।

मैं दक्षिण की सुघराई हूँ।

मैं प्यार बांटते आई हूँ।

मैं मंगल गीत बधाई हूँ।

मैं उन्नति की परिभाषा हूँ।

मैं रोजगार की आशा हूँ।

मैं युद्ध-काल की सेवा हूँ।

मैं शांति-काल की मेवा हूँ।

मैं पर्वत-सी ऊंचाई हूँ।

मैं नदियों की गहराई हूँ।

मैं मैदानों की रानी हूँ।

मैं गांव-शहर की पानी हूँ।

मैं वादी की हरियाली हूँ।

मैं झरना सी मतवाली हूँ।

मैं नहीं ठहरने वाली हूँ।

मैं और निखरने वाली हूँ।

मैं ढोता राम हनुमान हूँ।

मैं ही गीता मैं कुरान हूँ।

मैं सबकुछ ढोने वाली हूँ।

मैं प्रेम को बोने वाली हूँ। 

मैं दूरी को सिमटाती हूँ।

मैं आपस में मिलवाती हूँ।

मैं हवा से बातें करती हूँ।

मैं हिरणी-सी पग भरती हूँ।

मैं संस्कृति का संवाहक हूँ।

मैं निज ग्राहक सुखकारक हूँ।

मैं कमाख्या मैं देवघर हूँ।

मैं अजमेर मैं अमृतसर हूँ।

मैं माला वाली धागा हूँ।

मैं भारत-स्वर्ण सुहागा हूँ।

मैं भारत की चल रेखा हूँ।

मैं इसकी जीवन रेखा हूँ।

             ✒© विनय कुमार बुद्ध